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सदस्यः:सीताराम कुमावत

विकिसूक्तिः तः

श्लोक---- येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः । तेमर्त्यलोके भुवि भारभूताः मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति ॥

अर्थ:---- बाजुबन्द पुरुष को को शोभायमान नहीं करते हैं और ना ही चन्द्रमा के समान उज्जवल हार ,न स्नान,न चन्दन का लेप,न फूल और ना ही सजे हुए केश ही शोभा बढ़ाते हैं। केवल सुसंस्कृत प्रकार से धारण की हुई वाणी ही उसकी भली भांति शोभा बढ़ाती है साधारण आभूषण नष्ट हो जाते है परन्तु वाणी रूपी आभूषण निरन्तर जारी रहने वाला आभूषण हैं।

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